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भविष्य की सुरक्षा के लिए प्रकृति से जुड़े – प्रोफेसर डॉ. सैलेश अय्यर

अहमदाबाद, 4 जून l
नरनारायण शास्त्री इंस्टिट्यूट ऑफ़ फॉरेंसिक साइंस एंड साइबर सिक्योरिटी जेतलपुर अहमदाबाद के प्राचार्य प्रोफेसर डॉ. सैलेश अय्यर ने कहा है कि वर्तमान समय में अत्याधुनिक तकनीकी विकास और नवीनतम सुविधाओं के चलते मानव जीवन में कई परिवर्तन आए हैं और कई कार्यो में राहतकारी व्यवस्था हुई है लेकिन हमारा ध्यान प्रकृति और इससे जुड़े विभिन्न विषयों से हट गया है जिसके चलते हमारा पर्यावरण प्रभावित हो रहा है l हमारे भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए हमें प्रकृति और पर्यावरण की तरफ ध्यान देना आवश्यक है l विश्व पर्यावरण दिवस को लेकर उन्होंने कहा कि पुराने जमाने में सभी घरों के बाहर उपयोगी पौधे लगाए जाते थे लेकिन वर्तमान में बढ़ती आबादी, जनसंख्या के प्रभाव से शहरीकरण का विस्तार, प्रदूषण का प्रभाव आदि कारणों से हमारा पर्यावरण प्रभावित हुआ है तथा पेड़ पौधों की संख्या में भी कमी आती जा रही है जिसको देखते हुए इस बारे में चिंतन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हर घर में घरेलू उपयोग के पौधे लगाए जा सकते हैं, इसी तरह हमारे आसपास के वातावरण व क्षेत्र में भी पौधोंरोपण व इनके संरक्षण पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं है, लगाए हुए पौधे पनपे और उनका विकास हो इस बाबत उनकी सुरक्षा पर ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से पौधारोपण और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हर संभव प्रयास किया जा रहे हैं, साथ ही आम नागरिक को भी अपनी जिम्मेदारी समझ कर पौधारोपण व इनके संरक्षण के मामले में गंभीरता बरतनी होगी तभी हम और हमारा भविष्य सुरक्षित रह पाएगा l उन्होंने कहा कि वातावरण में बढ़ती गर्मी इस बात का संकेत है कि हम अपनी प्रकृति की सुरक्षा की जिम्मेदारी को पूरी नहीं कर पा रहे हैं जिसके कारण वातावरण में तापमान की बढ़ोतरी हो रही है। यह संकेत ठीक नहीं है l उन्होंने कहा कि आबादी क्षेत्र में भी पौधों को लगाने के साथ उनकी सुरक्षा पर ध्यान देना होगा तथा हमारे वन क्षेत्र सुरक्षित रहे इस बाबत हम सामूहिक रूप से प्रयास करें तो निसंदेह अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे l
डॉ. अय्यर ने वनीकरण (Reforestation) में प्रौद्योगिकी की भूमिका के उदाहरण भी साझा किए। उन्होंने बताया कि मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी/ड्रोन) का उपयोग बंजर अथवा क्षतिग्रस्त भूमि में “सीड पॉड्स” (बीज कैप्सूल) को गिराने या प्रक्षेपित करने के लिए किया जा रहा है। यह तकनीक पारंपरिक हाथों से पौधारोपण की तुलना में लगभग 25 गुना अधिक तेज और 80 प्रतिशत तक कम खर्चीली है। एक ड्रोन समूह (स्वार्म) प्रतिदिन 40,000 से 1,00,000 तक सीड पॉड्स ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में रोपित कर सकता है, जहां सामान्य रूप से पहुंचना कठिन होता है। उन्होंने बताया कि ये ड्रोन लक्षित पौधारोपण स्थलों का सटीक मानचित्रण करने के लिए लाइडार (LiDAR) तकनीक का उपयोग करते हैं। इस तकनीक की मदद से प्रत्येक स्थल पर कम बीजों का उपयोग करते हुए अधिक प्रभावी पौधारोपण किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, ड्रोन का उपयोग बीजों पर पानी का छिड़काव करने तथा उनके प्रारंभिक विकास में सहायता प्रदान करने के लिए भी किया जाता है, जिससे उनके अंकुरण और वृद्धि की संभावना बढ़ जाती है।

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