
आदिवासी अस्मिता की पुकार- विश्व सिकल सेल दिवस पर सिकल सेल मुक्त भारत का संकल्प!
“रक्त की एक छोटी-सी जांच, आने वाली पीढ़ियों की बड़ी सुरक्षा बन सकती है। 19 जून केवल एक दिवस नहीं, बल्कि सिकल सेल मुक्त भारत की दिशा में राष्ट्रीय जनजागरण का आह्वान है।”
- डॉ रजनीकांत मालोत, चिकित्सा विषयों के प्रमुख लेखक
हर वर्ष 19 जून को विश्व सिकल सेल जागरूकता दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल एक चिकित्सा समस्या की चर्चा का अवसर नहीं है, बल्कि उन लाखों परिवारों के दर्द, संघर्ष और आशा को समझने का दिन भी है जो सिकल सेल एनीमिया जैसी आनुवंशिक बीमारी से प्रभावित हैं। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह दिवस विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यहां विश्व के सबसे बड़े जनजातीय समुदायों में से एक निवास करता है और यही समुदाय सिकल सेल रोग के सबसे बड़े बोझ को भी वहन कर रहा है।
सिकल सेल एनीमिया एक वंशानुगत रक्त विकार है। यह कोई संक्रामक रोग नहीं है और न ही किसी व्यक्ति की गलती का परिणाम है। यह माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से पहुंचता है। इस रोग में लाल रक्त कोशिकाएं सामान्य गोलाकार आकार खोकर हंसिए (सिकल) के आकार की हो जाती हैं। परिणामस्वरूप वे रक्त वाहिकाओं में फंस जाती हैं और शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो जाती है। यही कारण है कि रोगी को बार-बार दर्द के दौरे, गंभीर रक्ताल्पता, संक्रमण, कमजोरी, विकास में बाधा और कई बार जीवन-घातक जटिलताओं का सामना करना पड़ता है।
भारत के अनेक जनजातीय क्षेत्रों में यह रोग एक मौन महामारी के रूप में मौजूद है। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड तथा अन्य आदिवासी बहुल राज्यों में हजारों गांव ऐसे हैं जहां अनेक परिवार इस रोग से प्रभावित हैं। दुखद तथ्य यह है कि कई लोग वर्षों तक यह भी नहीं जान पाते कि वे सिकल सेल जीन के वाहक हैं।
यही सिकल सेल रोग की सबसे बड़ी चुनौती है। रोग का वाहक व्यक्ति सामान्य और स्वस्थ दिखाई देता है। उसे किसी प्रकार की बीमारी नहीं होती। लेकिन यदि दो वाहक व्यक्तियों का विवाह हो जाए, तो उनकी संतान में सिकल सेल रोग होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इस प्रकार यह बीमारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है और पूरे परिवार को प्रभावित करती है।
यहीं से रोकथाम की आवश्यकता शुरू होती है। चिकित्सा विज्ञान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सिकल सेल रोग को काफी हद तक रोका जा सकता है। यदि युवाओं में समय पर जांच और जागरूकता बढ़ाई जाए, तो भविष्य में इस रोग के बोझ को नाटकीय रूप से कम किया जा सकता है। विवाह पूर्व सिकल सेल स्क्रीनिंग, आनुवंशिक परामर्श और परिवारों को सही जानकारी प्रदान करना इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम हैं।
आज जिस प्रकार रक्त समूह की जानकारी सामान्य बात मानी जाती है, उसी प्रकार प्रत्येक युवा को अपने सिकल सेल स्टेटस की जानकारी भी होनी चाहिए। यह केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का विषय है। यदि समाज इस दिशा में जागरूक हो जाए, तो हजारों बच्चों को जन्मजात पीड़ा से बचाया जा सकता है।
सिकल सेल के विरुद्ध लड़ाई में शीघ्र निदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नवजात शिशुओं की स्क्रीनिंग इस दिशा में एक क्रांतिकारी पहल सिद्ध हो सकती है। जन्म के तुरंत बाद रोग की पहचान हो जाने पर समय पर उपचार प्रारंभ किया जा सकता है, जिससे गंभीर जटिलताओं को रोका जा सके। अनेक विकसित देशों ने नवजात स्क्रीनिंग के माध्यम से सिकल सेल से होने वाली मृत्यु और विकलांगता को काफी हद तक कम किया है। भारत में भी इस दिशा में तेज गति से कार्य करने की आवश्यकता है।
उपचार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। फोलिक एसिड, संतुलित पोषण, पर्याप्त जल सेवन, संक्रमण की रोकथाम, टीकाकरण तथा नियमित चिकित्सकीय निगरानी रोग नियंत्रण के आधार हैं। हाइड्रॉक्सीयूरिया जैसी दवाएं दर्द के दौरे कम करने और रोगियों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने में प्रभावी सिद्ध हुई हैं। गंभीर परिस्थितियों में रक्त आधान जीवनरक्षक भूमिका निभाता है। कुछ चुनिंदा रोगियों में बोन मैरो अथवा स्टेम सेल प्रत्यारोपण स्थायी उपचार की संभावना भी प्रदान करता है।
लेकिन केवल अस्पतालों और दवाओं के भरोसे इस चुनौती का समाधान संभव नहीं है। सिकल सेल के विरुद्ध सबसे बड़ा हथियार जागरूकता है। दुर्भाग्यवश आज भी अनेक ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में इस रोग के बारे में पर्याप्त जानकारी का अभाव है। कई बार लोग इसे भाग्य, दैवी प्रकोप या अंधविश्वास से जोड़कर देखते हैं। ऐसे में स्वास्थ्य शिक्षा और वैज्ञानिक सोच का प्रसार अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
विद्यालयों, महाविद्यालयों, पंचायतों, आंगनवाड़ी केंद्रों, जनजातीय छात्रावासों और सामुदायिक संस्थाओं को इस अभियान का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। युवाओं, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और धार्मिक नेताओं की भागीदारी से यह संदेश समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जा सकता है। जब जागरूकता जन-आंदोलन का रूप लेगी, तभी सिकल सेल उन्मूलन का लक्ष्य साकार होगा।
भारत सरकार द्वारा प्रारंभ किया गया राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन इसी दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है। वर्ष 2047 तक सिकल सेल रोग को जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने का लक्ष्य केवल स्वास्थ्य क्षेत्र की योजना नहीं, बल्कि विकसित भारत के निर्माण का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। व्यापक स्क्रीनिंग, आनुवंशिक परामर्श, उपचार सुविधाओं का विस्तार तथा जनजातीय क्षेत्रों पर विशेष ध्यान इस मिशन की प्रमुख विशेषताएं हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सिकल सेल को केवल चिकित्सा का विषय न मानें, बल्कि इसे सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में देखें। जिस प्रकार पोलियो उन्मूलन में पूरे समाज ने भागीदारी निभाई और असंभव लगने वाले लक्ष्य को संभव बनाया, उसी प्रकार सिकल सेल उन्मूलन के लिए भी सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।
विश्व सिकल सेल जागरूकता दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम केवल रोग की चर्चा न करें, बल्कि समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाएं। प्रत्येक युवा जांच करवाए, प्रत्येक परिवार जागरूक बने, प्रत्येक नवजात की स्क्रीनिंग हो और प्रत्येक रोगी को सम्मानजनक उपचार मिले—यही इस दिवस का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।
आदिवासी समाज भारत की सांस्कृतिक आत्मा है। यदि हम उसके स्वास्थ्य की रक्षा नहीं कर पाए, तो विकास की कोई भी कहानी अधूरी रहेगी। इसलिए सिकल सेल के विरुद्ध संघर्ष केवल एक स्वास्थ्य अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, मानव गरिमा और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व का अभियान है।
आइए, इस 19 जून को संकल्प लें कि हम जागरूकता फैलाएंगे, जांच को बढ़ावा देंगे और सिकल सेल मुक्त भारत के निर्माण में सक्रिय भागीदार बनेंगे। क्योंकि स्वस्थ आदिवासी समाज ही स्वस्थ, सशक्त और विकसित भारत की आधारशिला है।
जागरूकता से पहचान, पहचान से रोकथाम और रोकथाम से सिकल सेल मुक्त भारत!
